56 प्रकार के भोग में भगवान राजीवलोचन ने खाया ठेठरी, खुरमी
अन्नकूट पर्व शहर सहित मंदिर में धूमधाम से मनाया गया
राजिम 3 नवंबर। शनिवार को अनुकूट पर्व के मौके पर क्षेत्र के प्रसिद्ध भगवान राजीवलोचन मंदिर में भगवान विष्णु के स्वरूप राजीवलोचन को छप्पन भोग खिलाया गया जिसमें छत्तीसगढ़ी व्यंजन को भी खास करके परोसा गया।प्रमुख रूप से ठेठरी,खुरमी,ऐरसा,पपची,चौसेला,बचांदी,पीड़िया,गुजिया,कुसली,सोहारी,तसमई, विभिन्न प्रकार की सब्जियां, अलग-अलग 10 प्रकार की भाजी इत्यादि खाद्य पदार्थों से भरे हुए प्राचीन एवं मिट्टी के बने पात्र जिनमें हडिया, कूड़ेड़ा, बांस का बना हुआ टूकना,पर्रा,पर्री,जरमन के गंजी, बाल्टी,पराट में रखे हुए थे। पूरा महामंडप व्यंजन से भर गया था। पुजारी महेंद्र सिंह ठाकुर ने बताया कि सुबह भगवान को स्नान कराकर श्रृंगार किया गया था जिससे उनकी शोभा देखते ही बन रही थी।
गोधूली बेला में शालिग्राम भगवान को गर्भगृह से निकालकर गोवर्धन के पास ले जाया गया। रोली सुनाया तथा आरती भी हुई, पश्चात प्रसाद भोग बांटा गया। इस अवसर पर भगवान राजीवलोचन को वस्त्राभूषण एवं रत्न आभूषण से अलंकृत किया गया था। भगवान राजीवलोचन को मोर पंख लगाए हुए थे। कृष्ण की वेशभूषा में श्रद्धालुओं को खासा लुभा रहे थे। इस मौके पर प्रमुख रूप से मंदिर के सर्वराकार चंद्रभान सिंह ठाकुर, शिव सिंह ठाकुर, राजेंद्र सिंह ठाकुर,बैकुंठ सिंह ठाकुर, रामकुमार सिंह ठाकुर, हर्ष सिंह ठाकुर, महेंद्र सिंह ठाकुर, सनत सिंह ठाकुर, शैलेंद्र सिंह ठाकुर, भरत सिंह ठाकुर, मनोज सिंह ठाकुर, रमेश सिंह ठाकुर, दिनेश सिंह ठाकुर, संतोष सिंह ठाकुर, सूरज सिंह ठाकुर, कान्हा सिंह ठाकुर, पुरोहित पंडित के अलावा बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे।
"भगवान राजीवलोचन ने धरा मनमोहिनी रूप*
इस अवसर पर सुबह से लेकर शाम और रात तक श्रद्धालुओं को भगवान का अलौकिक स्वरूप देखने को मिला जिसमें वह कानों में कुंडल, सर पर मुकुट, नासिका के पास रत्न, चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म, देह में जनेऊ, कमर में करधन, बाजूबंद आदि धारण किए हुए थे। खास करके भगवान मयूर पंख भी रखे हुए थे। बताया जाता है कि यह मंदिर छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में से एक है। ईंटों का मंदिर राजीवलोचन अर्थात भगवान विष्णु का है इसके द्वार की चौखट सुहावटी तथा सामने का गोपुर बहुत सुंदरता से उत्पन्न है। मंदिर के अंदर पाश्व भित्ती पर दो शिलालेख है जिसमें एक कुटिल लिपि में आठवीं नवी शताब्दी का है दूसरा शिलालेख चेदी संवत 896 अर्थात 1148 ईस्वी में लिखा गया है इसमें जगतपाल देव द्वारा निर्मित राम मंदिर अर्थात स्थानीय रामचंद्र देवल के निर्माण का उल्लेख मिलता है। राजीवलोचन मंदिर चतुर्थाकार में स्थित है। चारों को में वामन, बद्री, नृसिंह और वराह अवतार भगवान विराजमान है।
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