फसल नुकसानी का इकाई किसान के खेत को बनाया जाए :- तेजराम विद्रोही

फसल बीमा के लिए जबरदस्ती दबाव न बनाएं 

राजिम, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत खरीफ मौसम की मुख्य फसलों धान सिंचित एवं धान असिंचित तथा अन्य फसल मक्का, कोदो, कुटकी, रागी, सोयाबीन, मूंगफली, तुअर, मूंग एवं उड़द के लिए फसल बीमा कराने का अंतिम तारीख 31 जुलाई 2025 है और इसके लिए सरकार और पूरी अमला निजी बीमा कंपनियों को फायदा पहुँचाने में लगा हुआ है. ऋणी 
किसानों से दबाव पूर्ण बीमा कराने की शिकायत पर भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) छत्तीसगढ़ के महासचिव तेजराम विद्रोही ने विज्ञप्ति जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कि अधिसूचना के निर्देश क्रमांक 3 (क) में स्पष्ट प्रावधान है कि योजना ऋणी कृषको के लिए विकल्प चयन (Opt-Out) आधार पर क्रियान्वित होगी। ऋणी कृषक जो योजना में शामिल नहीं होना चाहते हैं, उन्हें भारत सरकार द्वारा जारी चयन (Opt-Out) प्रपत्रनुसार हस्ताक्षरित घोषणा पत्र बीमा आवेदन की अंतिम तिथि के सात दिवस पूर्व तक सम्बंधित वित्तीय संस्थान में अनिवार्य रूप से जमा करना होगा। ज़ब नियम कायदे वित्तीय संस्थाओं को मालूम है तब भी सरकार और उनके वित्तीय अमलों द्वारा किसानों पर फसल बीमा के लिए क्यों दबाव बनाया जा रहा है? क्या इसलिए कि बीमा की राशि किसानों से उनकी खेत की रकबे के आधार पर ली जाती है और ज़ब बीमा क्लेम देना होता है तब नुकसान का आंकलन ग्राम को इकाई मानकर किया जाता है जहाँ पर 75% से अधिक नुकसान होने की स्थिति में 25% तक ही क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है।

 उन्होंने आगे कहा कि फसल बीमा के प्रति किसानों की रूचि नहीं होने का सबसे बढ़ा कारण यही है कि ज़ब फ़सल बीमा उनके खेत के रकबा का होता है तो नुकसानी का आंकलन भी खेत में लगे फसल की क्षति के आधार पर किया जाना चाहिए जो कि होता नहीं है और दूसरा कारण यह कि सभी बीमा कंपनिया निजी क्षेत्र के हैं जो बैठे बिठाए आसानी से सरकार और किसानों से बीमा राशि प्राप्त कर मालामाल हो रहे हैं उनको देना कुछ नहीं बस पाना ही पाना है। इसलिए फसल बीमा कराना किसानों कि स्वेक्षा है उन पर किसी प्रकार दबाव न बनाया जाए और जिन किसानों का फसल बीमा हुआ है उनकी क्षतिपूर्ति की मूल्यांकन के लिए ग्राम को इकाई न मानकर खेत को इकाई माना जाए।

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