Nगर में आवारा पशु: "बिनोद, देख रहा है?" स्टाइल में प्रशासN का पंचनामा
"अरे बिनोद, देख रहा है? सड़क पे गाय-भैंस टहल रही हैं, मानो नगर का रोड इनका पिकनिक स्पॉट हो!" पंचायत का जेपी सिंह अगर आज हमारे नगर में चाय की चुस्की ले रहा होता, तो शायद यही बोलकर प्रशासन की टांग खींचता। मगर बिनोद भाई, ये माजरा कोई हंसी-ठिठोली का नहीं है। नगर के चौक-चौराहों, बस स्टैंड, और पुलों पर आवारा पशुओं का जमावड़ा ऐसा है, जैसे वो नगर की मालिक हों और हम सब किराएदार!
मुख्या ने तो अधिकारियों को साफ-साफ बोल दिया था, "बिनोद, इन पशुओं का इंतजाम करो, गौशाला में भेजो, सड़कें खाली करो!" लेकिन लगता है, अधिकारी बोले, "हां बिनोद, देख रहा है!" और फिर फाइलों के ढेर में घुस गए। जमीनी स्तर पर हाल वही पुराना—*सब चंगा सी!* सड़कों पर गाय-भैंस की टोलियां ऐसी टहल रही हैं, मानो वो कह रही हों, "बिनोद, ये नगर हमारा, तू बस देखता रह!"
रात के अंधेरे में तो ये आवारा पशु सड़कों पर हॉरर फिल्म का सीन सेट कर रहे हैं। गाड़ियां टकरा रही हैं, लोग चोटिल हो रहे हैं, और प्रशासन? वो तो पंचायत के प्रधानी की तरह बस बोल रहा है, "अरे बिनोद, देख रहा है, सब ठीक हो जाएगा!" वो डायलॉग याद है ना, जब जेपी सिंह कहता है, "ये तो वही बात हुई कि बिना तेल के दीया जलाना!" बस, प्रशासन भी बिना इच्छाशक्ति और ठोस प्लान के कागजी गाय-भैंस गिन रहा है।
बस स्टैंड पर तो गायों ने ऐसा डेरा डाला है, जैसे वो बस की टिकट चेक करने वाली हों। राहगीर डरते-डरते चलते हैं, और वाहन चालक हॉर्न बजाते रहते हैं, मानो गायों को *रेड कार्पेट वेलकम* दे रहे हों। सवाल ये है, "बिनोद, प्रशासन इतना सुस्त क्यों?" गौशालाएं बनाने का बजट नहीं है? कर्मचारियों की कमी है? या फिर ये वही पुरानी *पंचायत* स्टाइल है, जहां अधिकारी बोलते हैं, "बिनोद, सब फाइल में है, टेंशन मत लो!"
पंचायत का भोलू भाई का डायलॉग याद करो, "अरे, ये तो वही बात हुई कि बकरी के सामने भूतनाथ नाच रहा है, और बकरी बोले- भाई, तेरा डांस तो ठीक है, पर खाना कब देगा?" ठीक वैसे ही, प्रशासन की मीटिंगें, कागजी कार्रवाइयां तो चल रही हैं, पर सड़क से गाय-भैंस हटाने का ठोस काम कब होगा, बिनोद? गौशालाएं बनें, पशुओं को वहां शिफ्ट किया जाए, सड़कों पर निगरानी बढ़े—ये सब करना इतना मुश्किल तो नहीं, फिर प्रशासन क्यों सो रहा है?
तो बिनोद भाई, अगर तू भी नगर की सड़कों पर गाय-भैंस के बीच फंस चुका है, और गाड़ी का हॉर्न बजाते-बजाते थक गया है, तो बस इतना बोल, "अरे, ये तो विकास का नया मॉडल है—गाय रोड पे, गाड़ी फुटपाथ पे!" और हां, प्रशासन से एक गुजारिश, "बिनोद, थोड़ा जाग, वरना जनता बोलेगी—ये नगर नहीं, गौशाला बन गया है!"
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