हाईकोर्ट को ठेंगा दिखाया! सियासी दबाव में नवापारा नगर पालिका ने कोर्ट आदेश की धज्जियां उड़ाई, 88 हजार बकाया के बावजूद तालाबों में मछली निकालने की अनुमति


हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी, सियासी दबाव में लाचार दिखी नगर पालिका


नवापारा राजिम। शहर में कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नगर पालिका गोबरा नवापारा द्वारा उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों की खुलेआम अनदेखी किए जाने का मामला सामने आया है, जिससे प्रशासन की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
सूत्रों के अनुसार, न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित कार्यों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। आरोप है कि पूरे मामले में राजनीतिक दबाव हावी रहा, जिसके चलते नगर पालिका ने नियमों को दरकिनार करते हुए आंखें मूंद लीं। यह स्थिति न केवल न्यायालय की अवमानना को दर्शाती है, बल्कि कानून के शासन पर भी सीधा प्रहार मानी जा रही है।

क्या है पूरा मामला

सन 2017 में नगर पालिका सीमा क्षेत्र में स्थित विभिन्न तालाबों (अमहा तालाब, नवा तरिया, तेलीन डबरी, अस्पताल डबरी और कांदा डबरी) में मछली पालन एवं मत्स्याखेट हेतु दस वर्षीय पट्टा देने हेतु नीलामी सूचना प्रकाशित की गई। जिसमें नियमतः मछुआरा सहकारी समिति, मछुवा समूह मछुवा व्यक्ति को दिया जाना था परन्तु राजनीतिक रसूख के आगे सभी नियमों की अनदेखी कर पावन जागृति महिला स्व सहायता समूह को 10 वर्षीय लीज पर दे दिया गया। इस हेतु बाकायदा बोली लगाई गई और परिषद द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकृति भी कराई गई। परन्तु मत्स्य पालन और मत्स्याखेट हेतु मूल नियम की अनदेखी की गई।

निषाद समाज ने जताई थी आपत्ति

बाल समाज भक्त निषाद मंडली, गोबरा-नवापारा' के प्रेसिडेंट द्वारा एक शिकायत दर्ज कराई गई थी। इस शिकायत में कहा गया था कि साल 2017 में जारी किए गए एक विज्ञापन के तहत, एक तालाब को एक सोसाइटी को आवंटित कर दिया गया है। यह आवंटन, इस क्षेत्र पर लागू होने वाली 'मत्स्य पालन नीति' के खिलाफ है, और साथ ही इस नीति के क्लॉज़ 1.6, 2.6, 8.1, 8.2 और 8.3 के भी खिलाफ है।


उप संचालक मछलीपालन एवं पालिका ने कर दी थी लीज निरस्त
उक्त लीज के संबंध में शिकायत प्राप्त होने के बाद उप संचालक ने वि. ख. अभनपुर के मत्स्य निरीक्षक से जांच कराया। रिपोर्ट की प्रति प्राप्त होने के बाद, मत्स्य निदेशालय ने सीएमओ नगर पालिका परिषद गोबरा नवापारा को पत्र क्र. 655, दिनांक 26/08/2021 को एक पत्र लिखा, जिसमें पट्टा समझौते को रद्द करने और राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई मत्स्य नीति की प्रक्रिया के अनुसार पुनः निविदा (retendering) के लिए आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया था। इस पत्र के परिपालन में नपा ने 18/10/2021 को परिषद की सामान्य बैठक लेकर उक्त लीज आबंटन को पूर्ण बहुमत से रद्द करने का निर्णय लिया। इस निर्णय को चुनौती देते हुए समूह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिल गई।
हाईकोर्ट ने समूह की अंतरिम राहत रद्द की

हाईकोर्ट ने डब्ल्यूपीसी न. 4891/2021 के संदर्भ में 25/07/2025 को दिया अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि दूसरे राउंड में भी पिटीशनर की तरफ से कोई रिप्रेजेंटेशन नहीं हुआ, इसलिए इस कोर्ट के पास प्रॉसिक्यूशन की कमी के कारण इस रिट पिटीशन को खारिज करने के अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं बचा है।
इसलिए, प्रॉसिक्यूशन की कमी के कारण यह रिट पिटीशन खारिज की जाती है। पहले दी गई अंतरिम राहत रद्द की जाती है।

पालिका ने हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी कर समूह को मछली निकालने अनुमति दी

हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद नगर पालिका परिषद ने उक्त समूह को 15 दिन के लिए तालाबों से मछली निकालने की अनुमति दे दी। जबकि कोर्ट के अनुसार समूह को किसी भी प्रकार का राहत दावा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।

समूह का 88 हजार बकाया

समूह को पंजीकृत समझौता के तहत प्रति वर्ष लीज की निर्धारित राशि जमा करना था परन्तु 2023-24 का 28600, 2024-25 का 28600 और 2025-26 का 30800 इस प्रकार कुल 88000 की राशि बकाया है। बावजूद इसके आपसी सांठ गांठ कर निजी हितों को साधने और शासन द्वारा वसूली योग्य राशि की अनदेखी कर उन्हें मछली निकालने की अनुमति दे दी गई।

राजस्व निरीक्षक की भूमिका संदिग्ध

इस पूरे मामले में राजस्व निरीक्षक निखिल चंद्राकर की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। उन्होंने अपने कर्तव्य का सही तरह से निर्वहन नहीं किया। इस मामले में हमारे प्रतिनिधि ने उनसे पूछा कि इतनी राशि बकाया होने के बावजूद किस आधार पर अनुमति दी गई तो उन्होंने कहा कि पालिका के अधिकार क्षेत्र का मामला है। 
जबकि आम नागरिक का पालिका में किसी भी प्रकार का कोई बकाया रहता है तो उसे पूरा जमा किए बिना कोई भी दस्तावेज पालिका द्वारा प्रदान नहीं किया जाता।

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों में इस मामले को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि न्यायालय के आदेशों का ही पालन नहीं होगा, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की लापरवाही और दबाव में लिया गया निर्णय न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस गंभीर मामले में उच्च स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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