31.73 करोड़ की सिंचाई योजना पर बड़ा सवाल: करोड़ों खर्च, फिर भी खेत प्यासे! क्या अधूरी परियोजना का कराया गया लोकार्पण?
धमतरी/कुरूद। किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने और 1054.25 हेक्टेयर खरीफ क्षेत्र को लाभान्वित करने के उद्देश्य से लगभग 31 करोड़ 73 लाख रुपये की लागत से निर्मित कोड़ेबोड़ सूक्ष्म सिंचाई योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। किसानों का आरोप है कि करोड़ों रुपये खर्च होने और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा लोकार्पण किए जाने के बावजूद आज तक बड़ी संख्या में खेतों तक पानी नहीं पहुंच सका है।
नाबार्ड के वित्तीय सहयोग से निर्मित इस परियोजना का कार्य जल संसाधन विभाग, बांध संभाग क्रमांक-2 रुद्री धमतरी द्वारा कराया गया। परियोजना स्थल पर लगे बोर्ड के अनुसार कार्य पूर्ण करने की निर्धारित तिथि 27 दिसंबर 2024 थी। इसके बाद 23 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के हाथों इसका लोकार्पण भी कराया गया, लेकिन किसानों का कहना है कि जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल अलग है।
ग्रामीणों का आरोप है कि अनेक खेतों तक पाइपलाइन आज भी नहीं पहुंची है। जहां पाइप डाली गई है, वहां भी पानी नहीं चढ़ रहा। किसानों के अनुसार पाइपलाइन बिछाने में तकनीकी मानकों और लेवल का समुचित परीक्षण नहीं किया गया, जिससे पूरी व्यवस्था कई स्थानों पर बेकार साबित हो रही है।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि उन्होंने विभागीय अधिकारियों से मजबूत और टिकाऊ पाइपलाइन लगाने की मांग की थी, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर कम गुणवत्ता वाली प्लास्टिक पाइपें बिछा दी गईं, जिनमें कई जगह टूट-फूट दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि निर्माण के दौरान लगातार शिकायतों के बावजूद विभाग ने कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की।
क्या मुख्यमंत्री को दिखाई गई अधूरी तस्वीर?
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि किसानों के आरोप सही हैं और परियोजना का लाभ वास्तव में जमीन पर नहीं पहुंचा था, तो आखिर मुख्यमंत्री से इसका लोकार्पण किस आधार पर कराया गया? क्या लोकार्पण से पहले विभाग ने परियोजना का वास्तविक तकनीकी परीक्षण कराया था? या फिर अधूरी व्यवस्था को पूर्ण बताकर प्रदेश के सर्वोच्च नेतृत्व के समक्ष प्रस्तुत किया गया?
यदि यह स्थिति सही पाई जाती है, तो यह केवल निर्माण एजेंसी या ठेकेदार का मामला नहीं रह जाता, बल्कि निरीक्षण, गुणवत्ता परीक्षण, माप पुस्तिका (MB), भुगतान स्वीकृति, पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी कठघरे में खड़ी होती है।
8-9 साल बाद भी अधूरी तस्वीर
वर्ष 2017-18 में प्रशासकीय स्वीकृति मिलने के बाद लगभग आठ-नौ वर्षों में तैयार हुई इस परियोजना से किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद थी। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि आज भी कई खेतों तक एक बूंद पानी नहीं पहुंचा है। ऐसे में करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि के उपयोग और परियोजना की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच की मांग
किसानों ने राज्य शासन से मांग की है कि इस पूरी परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी, वित्तीय एवं गुणवत्ता जांच कराई जाए। साथ ही माप पुस्तिका (MB), भुगतान विवरण, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, पूर्णता प्रमाण-पत्र, उपयोगिता प्रमाण-पत्र तथा वास्तविक सिंचाई क्षमता का सार्वजनिक सत्यापन कराया जाए। यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों एवं ठेकेदार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल...
क्या 31.73 करोड़ रुपये की यह परियोजना वास्तव में किसानों के लिए बनी थी या केवल सरकारी रिकॉर्ड में पूरी दिखाने के लिए? यदि खेतों तक पानी नहीं पहुंचा, तो आखिर करोड़ों रुपये का लाभ किसे मिला? इन सवालों का जवाब अब शासन और जल संसाधन विभाग को देना होगा।
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