आदिवासी सेवा भूमि घोटाला: कथित आरोपी पहुंचे हाई कोर्ट, पर नहीं मिला 'स्टे'; FIR टालने में जुटा प्रशासन!
अभनपुर/गोबरा नवापारा।
राजधानी रायपुर के ग्रामीण क्षेत्र अभनपुर के अंतर्गत आने वाले ग्राम कुर्रा में आदिवासी सेवा भूमि (कोटवारी भूमि) की अवैध खरीदी-बिक्री और सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी का एक बड़ा मामला गरमाया हुआ है। अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अभनपुर द्वारा मामले की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार को तत्काल पुलिस थाने में एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिखित निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, प्रशासनिक ढील और कानूनी दांव-पेचों के चलते अब तक कथित मुख्य आरोपियों पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है। इस बीच, कथित मुख्य क्रेता ने कार्रवाई से बचने के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
SDM जांच में हुआ बड़ा खुलासा: बिना अनुमति बेची गई कोटवारी जमीन
राजस्व विभाग की उच्च स्तरीय जांच में यह प्रमाणित हो चुका है कि ग्राम कूरी स्थित पुराना खसरा नंबर 641 (वर्तमान खसरा नंबर 941, रकबा 0.53 हेक्टेयर) शासकीय सेवा भूमि की श्रेणी में आता है। नियमानुसार, इस प्रकार की शासकीय या कोटवारी भूमि को बेचने का अधिकार किसी को नहीं होता। इसके बावजूद, मूल विक्रेताओं द्वारा सक्षम अधिकारी (कलेक्टर/शासन) की अनुमति के बिना वर्ष 2011 में इसे कथित क्रेता केशव सोनकर के पक्ष में रजिस्ट्री कर दिया गया। जांच में यह भी सामने आया है कि इस सौदे को अंजाम देने के लिए जाति संबंधी दस्तावेजों में भारी कूटरचना (Forgery) और तथ्यों को जानबूझकर छिपाया गया, जिसे प्रथम दृष्ट्या छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के तहत गंभीर दंडनीय अपराध माना गया है।
हाई कोर्ट से कथित आरोपी को नहीं मिला अंतरिम राहत
कार्रवाई के डर से कथित आरोपी ने बिलासपुर हाई कोर्ट में एक रिट याचिका (WPC No. 5125 of 2026) दायर की है। हालांकि, दिनांक 09 अक्टूबर 2026 को हुई प्रारंभिक सुनवाई में हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीश अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने SDM अभनपुर के आदेश पर कोई स्टे (रोक) नहीं लगाया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पक्ष द्वारा अपठनीय दस्तावेजों की जगह स्पष्ट टाइप्ड कॉपी जमा करने के आवेदन को खारिज करते हुए मामले को आगामी सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया है। कानूनी जानकारों के अनुसार, जब तक कोर्ट स्पष्ट रोक नहीं लगाता, तब तक पुलिस और प्रशासन एफआईआर दर्ज करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
पुलिस और प्रशासन के बीच फंसा तकनीकी पेंच
स्थानीय सूत्रों और हालिया मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अनुविभागीय अधिकारी के कड़े रुख के बाद तहसील कार्यालय द्वारा थाने में शिकायत तो भेजी गई, लेकिन पुलिस ने तकनीकी आधार पर इसे वापस लौटा दिया। पुलिस का कहना है कि राजस्व विभाग अपने जांच प्रतिवेदन के आधार पर स्पष्ट रूप से उन सभी विशिष्ट व्यक्तियों के नामों की सूची दे, जिनके खिलाफ धोखाधड़ी (धारा 420) और कूटकरण (467, 468) का मुकदमा दर्ज किया जाना है। इस तकनीकी तालमेल की कमी का सीधा फायदा कथित आरोपी पक्ष को मिल रहा है, जो हाई कोर्ट में समय लेकर मामले को लटकाने का प्रयास कर रहा है।
क्या कहता है हाई कोर्ट का पुराना रुख?
इसी वर्ष जुलाई 2026 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय फुल बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी स्थिति में सेवा भूमि (कोटवारी भूमि) पर किसी का मालिकाना हक नहीं हो सकता और इसका क्रय-विक्रय पूरी तरह शून्य व अवैध माना जाएगा। ऐसे में विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी सुनवाई में कथित आरोपी की याचिका खारिज होने की पूरी संभावना है। अब देखना यह होगा कि गोबरा नवापारा नायब तहसीलदार पुलिस द्वारा मांगी गई स्पष्ट रिपोर्ट कब तक सौंपते हैं और करोड़ों रुपये की इस सरकारी जमीन घोटाले के कथित दोषियों के पीछे पुलिस कब तक पहुंचती है।
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